Rohru or Chirgaon हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले में स्थित प्रमुख बागवानी क्षेत्र हैं, जो अपनी उच्च गुणवत्ता वाली सेब की पैदावार के लिए प्रसिद्ध हैं। यह क्षेत्र जिला शिमला से लगभग 130 किलोमीटर दूर स्थित है और यहाँ की पहाड़ियाँ न केवल प्राकृतिक सुंदरता बल्कि सेब उत्पादन के लिए भी जानी जाती हैं। 2024 का सेब सीजन बागवानों के लिए चुनौतियों से भरा रहा, लेकिन सरकार के नए नियमों और बाजार की मांगों ने उद्योग में कुछ सकारात्मक बदलाव भी लाए।
2024 का सेब सीजन: बागवानों के लिए कठिनाइयाँ
2024 में बागवानों को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। इनमें मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन, कम कीमतें और परिवहन से जुड़ी समस्याएँ शामिल रहीं। मौसम परिवर्तन के कारण इस बार सेब की गुणवत्ता प्रभावित हुई। हिमाचल प्रदेश में सेब उत्पादन के लिए आवश्यक ठंडे मौसम और पर्याप्त बर्फबारी की कमी के कारण फलों की गुणवत्ता पर असर पड़ा।
मौसम की अनिश्चितताओं के साथ-साथ, बागवानों को कम कीमतों की समस्या का भी सामना करना पड़ा। 2024 में सेब के दामों में भारी गिरावट देखी गई, जिससे किसानों को उचित लाभ नहीं मिल पाया। बागवानों का कहना है कि 15 साल पहले जो कीमतें उन्हें मिलती थीं, इस वर्ष वे उससे भी कम हो गईं।

सरकार द्वारा यूनिवर्सल कार्टन की अनिवार्यता
सरकार ने 2024 में सेब के व्यापार में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया और यूनिवर्सल कार्टन को अनिवार्य कर दिया। इससे पहले बागवान टेलिस्कोपिक कार्टन में सेब पैक करते थे, जिनमें 28 से 38 किलो तक सेब भरा जाता था। इन कार्टनों में खरीदारों को ज्यादा लाभ होता था क्योंकि वे कम कीमत में अधिक सेब खरीद सकते थे।
यूनिवर्सल कार्टन के लागू होने से यह सुनिश्चित किया गया कि एक कार्टन में केवल 22 से 24 किलो तक सेब भरा जाए। इससे किसानों को प्रति किलो के हिसाब से बेहतर कीमत मिलने लगी और बाजार में पारदर्शिता बढ़ी। हालांकि, प्रारंभ में बागवान इस नए सिस्टम से अनजान थे और उन्हें इससे तालमेल बिठाने में समय लगा।
बाजार में सेब की कीमतें और खरीदारों की माँगें
2024 में Rohru और Chirgaon में सेब के दामों में गिरावट दर्ज की गई। टेलिस्कोपिक कार्टन में सेब की कीमतें लगभग ₹2000 प्रति बॉक्स थीं, जो कि प्रति किलो के हिसाब से ₹50-70 बैठती थीं। इससे बागवानों को भारी नुकसान हुआ।
यूनिवर्सल कार्टन आने के बाद भी बाजार में दाम स्थिर नहीं हो पाए। कुछ बड़े खरीदार जैसे कि अदानी और अन्य निजी कंपनियाँ सेब की कीमतों को नियंत्रित कर रही थीं। बागवानों ने मांग की कि सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिले और निजी कंपनियाँ कीमतों को मनमाने ढंग से तय न करें।
बागवानों की प्रमुख माँगें
बागवानों ने 2024 में कई माँगें सरकार के सामने रखीं, जिनमें प्रमुख थीं:
- सेब की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय की जाए।
- बागवानों को सरकारी सब्सिडी मिले।
- निजी कंपनियों द्वारा सेब की कीमतों को मनमाने ढंग से तय करने से रोका जाए।
- बागवानी से संबंधित इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जाए, विशेष रूप से कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं में सुधार हो।
- परिवहन व्यवस्था को बेहतर बनाया जाए ताकि किसानों को अपनी फसल बेचने में कठिनाई न हो।
बागवानों का यह भी कहना है कि अगर सरकार उनकी माँगों को पूरा नहीं करती, तो वे भविष्य में बड़े स्तर पर आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे।

मौसम परिवर्तन और सेब उत्पादन पर प्रभाव
Rohru और Chirgaon में सेब उत्पादन की सबसे बड़ी चुनौती जलवायु परिवर्तन बन चुका है। बागवानों को इस साल कम बर्फबारी के कारण काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। सेब की गुणवत्ता के लिए आवश्यक चिलिंग ऑवर्स पूरे नहीं हो पाए, जिससे फलों का आकार छोटा रहा और उनकी मिठास भी कम हो गई।
इसके अलावा, असमय बारिश और ओलावृष्टि ने भी सेब उत्पादन को प्रभावित किया। बागवानों का कहना है कि यदि सरकार जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए विशेष योजनाएँ नहीं बनाती, तो आने वाले वर्षों में सेब उत्पादन और अधिक प्रभावित हो सकता है।
भविष्य की संभावनाएँ और सुधार की आवश्यकता
हालांकि 2024 का सेब सीजन बागवानों के लिए कठिनाइयों से भरा रहा, लेकिन इसमें कुछ सकारात्मक बदलाव भी हुए। यूनिवर्सल कार्टन का आना किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है, बशर्ते बाजार में कीमतें स्थिर हों।
सरकार को निम्नलिखित कदम उठाने की आवश्यकता है:
- न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) लागू करना
- बागवानों को सब्सिडी और आर्थिक सहायता प्रदान करना
- बेहतर कोल्ड स्टोरेज सुविधाएँ विकसित करना
- मौसम पूर्वानुमान और आधुनिक तकनीकों को अपनाने के लिए बागवानों को प्रशिक्षित करना
निष्कर्ष
Rohru और Chirgaon में 2024 का सेब सीजन बागवानों के लिए आसान नहीं रहा। कम कीमतों, जलवायु परिवर्तन और परिवहन संबंधी समस्याओं ने किसानों की चिंताओं को बढ़ा दिया। सरकार द्वारा यूनिवर्सल कार्टन की अनिवार्यता एक अच्छा कदम था, लेकिन बागवानों की मुख्य समस्या उचित मूल्य न मिलना रही।
आने वाले वर्षों में, यदि सरकार और किसान मिलकर समाधान निकालते हैं, तो सेब उद्योग फिर से मजबूत हो सकता है। बागवानों को आशा है कि उनकी मेहनत का सही मूल्य मिलेगा और भविष्य में सेब उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए ठोस नीतियाँ बनाई जाएंगी।
