क्या है पूरा मामला?
हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में सेब की खेती लाखों परिवारों की आजीविका का मुख्य स्रोत है। यहां के कई किसान पिछले 20-30 वर्षों से वन विभाग की भूमि पर सेब के बागान लगाकर जीवन यापन कर रहे हैं। लेकिन हाल ही में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक आदेश में राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह वन भूमि पर हुए सभी कब्जों को हटाए, जिसमें फलदार सेब के पेड़ भी शामिल थे।
इस आदेश के बाद सरकार ने करीब 5,000 सेब के पेड़ कटवा दिए, और अनुमान लगाया गया कि करीब 50,000 से अधिक पेड़ खतरे में हैं। किसानों और बागवानों के विरोध के बावजूद, सरकार ने कार्रवाई शुरू कर दी थी।
इस फैसले को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर विचार करते हुए 2 जुलाई 2025 के हाईकोर्ट के आदेश पर रोक (Stay) लगा दी है।
⚖️ Supreme Court के फैसले की मुख्य बातें
Supreme Court की तीन न्यायाधीशों की पीठ (CJI बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति विनोद चंद्रन और एन.वी. अंजारिया) ने स्पष्ट किया कि फलदायक सेब के पेड़ों को फिलहाल नहीं काटा जाएगा।
राज्य सरकार को इन पेड़ों से निकले फलों की नीलामी (Auction) करने की अनुमति दी गई है, लेकिन पेड़ों को नहीं काटा जा सकता।
अदालत ने माना कि इस मुद्दे में आर्थिक, पर्यावरणीय और मानवीय पहलुओं का संतुलन ज़रूरी है।
सरकार को 16 सितंबर 2025 तक सुप्रीम कोर्ट में विस्तृत हलफनामा (affidavit) दाखिल करने को कहा गया है।
हिमाचल में कितनी गंभीर है स्थिति?
हिमाचल प्रदेश के कई जिलों — जैसे शिमला, किन्नौर, मंडी और कुल्लू — में सेब की खेती प्रमुख है। कई किसानों ने 20–30 साल पहले उन जगहों पर सेब के पेड़ लगाए, जिन्हें वे पारंपरिक रूप से अपनी जमीन मानते हैं, लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में वह भूमि वन विभाग के अधीन है।
सरकारी रिपोर्टों के अनुसार:
लगभग 1 लाख सेब के पेड़ ऐसे हैं जो वन भूमि पर लगे हुए हैं।
इनमें से कई पेड़ फल देने की स्थिति में हैं, और किसानों की आमदनी का एकमात्र साधन हैं।
इस आदेश के बाद किसानों में भय का माहौल था कि कहीं उनका पूरा जीवन भर की मेहनत एक झटके में नष्ट न हो जाए।
🧾 क्या है वन भूमि और क्यों होता है विवाद?
वन भूमि वह जमीन होती है जो सरकार द्वारा “फॉरेस्ट” के रूप में अधिसूचित होती है। इसका रखरखाव और उपयोग वन विभाग (Forest Department) के नियमों के अनुसार होता है। इस पर कोई भी निजी कब्जा, खेती या निर्माण गैरकानूनी माना जाता है।
लेकिन भारत के कई हिस्सों, खासकर पहाड़ी और आदिवासी इलाकों में, लोग पीढ़ियों से इस भूमि पर रहते आए हैं, खेती करते आए हैं — बिना इस बात की जानकारी के कि वह भूमि “वन भूमि” है।
Forest Rights Act 2006 क्या कहता है?
Forest Rights Act (FRA) 2006 एक ऐतिहासिक कानून है जिसे भारत सरकार ने आदिवासी और परंपरागत वनवासियों के अधिकारों को मान्यता देने के लिए लागू किया था।
इस कानून के अंतर्गत:
परंपरागत वन निवासी, जो 3 पीढ़ियों (लगभग 75 साल) से किसी वन भूमि पर रह रहे हैं, उस भूमि के व्यक्तिगत स्वामित्व का दावा कर सकते हैं।
सामुदायिक अधिकार भी मिलते हैं — जैसे जल, जंगल, चारागाह, पूजा स्थल आदि पर सामूहिक उपयोग का अधिकार।
कानून के तहत दावे करने के लिए ग्राम सभा से प्रमाण, उपयुक्त दस्तावेज, और प्रशासन की समीक्षा की प्रक्रिया होती है।
हिमाचल में FRA की क्रियान्वयन प्रक्रिया धीमी और जटिल रही है। हजारों किसानों ने आवेदन दिए, लेकिन कई दावे अधूरे दस्तावेज या प्रशासनिक विलंब के कारण खारिज हो गए।
🧑🌾 किसानों और बागवानों की पीड़ा
इस मुद्दे पर बागवानों की मुख्य मांगें थीं:
उन्हें Forest Rights Act के तहत उचित मौका दिया जाए।
वन भूमि पर लगे पुराने बागानों को नियमित किया जाए, विशेष रूप से वे जो 20–30 वर्षों से मौजूद हैं।
अगर सरकार जमीन को वापस लेना ही चाहती है तो वैकल्पिक भूमि या मुआवज़ा दिया जाए।
पूरे राज्य में वन भूमि सर्वेक्षण और सीमांकन पारदर्शी तरीके से हो।
🌱 पर्यावरणीय दृष्टिकोण से क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
सेब के पेड़ कार्बन अवशोषण (Carbon Sink) में मदद करते हैं।
ये पेड़ मिट्टी का क्षरण रोकते हैं, जलस्तर को संतुलित रखते हैं।
बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से पर्यावरणीय असंतुलन हो सकता है।
इसलिए Supreme Court ने यह स्पष्ट किया कि पर्यावरण संरक्षण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, भले ही कब्जा तकनीकी रूप से “अवैध” हो।
🏛️ हिमाचल सरकार की स्थिति और प्रस्तावित नीति
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि:
वे चाहते हैं कि ऐसे बागों को विनियमित (Regularize) किया जाए जो 20–30 वर्षों से मौजूद हैं।
सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि नए अवैध कब्जे न हों, लेकिन पुराने बागवानों को राहत दी जाए।
एक नई वन भूमि नीति प्रस्तावित है जिसमें ऐसे मामलों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश होंगे।
किसानों के लिए राहत, लेकिन चुनौतियां बरकरार
Supreme Court का आदेश बेशक एक तत्काल राहत है, लेकिन यह अंतिम समाधान नहीं है। सरकार और प्रशासन को अब आगे बढ़कर:
Forest Rights Act को सक्रिय रूप से लागू करना होगा।
वन भूमि का वैज्ञानिक सीमांकन (demarcation) करना होगा।
किसानों को भरोसे में लेकर पारदर्शी निर्णय लेने होंगे।
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